Monday, August 6, 2012

के सुबह सुबह तेरे घर का जो दरबाजा खुला देखा..
तू दिखी इक नज़र के तीर्थों के दर्शन हो गये ....अश्वनी भारद्वाज
अंदाज़ -ए- बफा इश्क में कोई सीखे उनसे....
मार के पत्थर वो मरहम लगाने आते हैं..
तूफान को रास्ता मेरे घर का बताके...
वो मेरे अजीज मेरे घर सजाने आते हैं..अश्वनी भारद्वाज
कुछ साल लगे लिखने में कुछ देने की सोच में बिता दिए...
वो ख़त मेरी जागीर ही रहा,हाल-ए -दिल बयाँ न कर सका..अश्वनी भारद्वाज
मिन्जों प्यार तेरे दा सहारा जे मिली गया हुंदा.
तां डुब्बे इश्के च अनु नु किनारा मिली गया हुंदा.
तेरे मापेयां दी जिदद ज्वाई नोकर सरकारी चाहिदा..
हुंदा मास्टर जे अनु ते,मिन्जों बी छुआरा मिली गया हुंदा.
मेरी आखों से फूट पड़ता है तेरे प्यार का सैलाब,
मुझे लगता है के इश्क अब कयामत के दौर मैं है...अश्वनी भारद्वाज